15 अक्टूबर 2025 की सुबह भारतीय मनोरंजन जगत के लिए गहरे शोक की खबर लेकर आई।
टीवी और फ़िल्मों की दुनिया के दिग्गज अभिनेता पंकज धीर अब हमारे बीच नहीं रहे।
68 वर्ष की उम्र में उन्होंने कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद मुंबई में अंतिम सांस ली।
उनके निधन के साथ मानो भारतीय टेलीविज़न का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया।
जिस चेहरे को लोगों ने “महाभारत” के कर्ण के रूप में पूजा, वह चेहरा अब सिर्फ़ यादों में रह गया है।
उनकी विदाई ने लाखों दर्शकों की आंखें नम कर दीं — क्योंकि वो सिर्फ़ अभिनेता नहीं, एक भावना थे।
प्रारंभिक जीवन और परिवार
पंकज धीर का जन्म 9 नवंबर 1956 को मुंबई (महाराष्ट्र) में हुआ था।
उनके पिता सी. एल. धीर (C. L. Dheer) स्वयं फिल्म निर्देशक थे, जिनके मार्गदर्शन में पंकज ने बचपन से ही अभिनय की दुनिया देखी।
उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा मुंबई से पूरी की और थिएटर के प्रति रुझान बहुत कम उम्र में ही विकसित हो गया था।
परिवार में कला का माहौल था — और यही माहौल उन्हें अभिनय की दिशा में ले गया।
करियर की शुरुआत
पंकज धीर ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1980 के दशक में की।
पहले कुछ छोटे रोल निभाने के बाद, उन्हें 1988 में बी. आर. चोपड़ा की “महाभारत” में कर्ण की भूमिका निभाने का मौका मिला — और यही भूमिका उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
उनका अभिनय इतना प्रभावशाली था कि आज भी जब “महाभारत” का नाम लिया जाता है, तो “कर्ण” के रूप में पंकज धीर की ही छवि सामने आती है।
कर्ण का संवाद “दानवीर कर्ण” और उनकी गरिमा से भरी मुस्कान आज भी करोड़ों दर्शकों के दिलों में बसी है।
कर्ण बनकर अमर हुए पंकज धीर
“महाभारत” के हर किरदार का अपना महत्त्व था, लेकिन “कर्ण” का दर्द, उसका दान और उसकी गरिमा — सब कुछ पंकज धीर के चेहरे पर जीवंत हो उठा।
उनकी आवाज़ में शौर्य था, संवाद में करुणा थी, और आंखों में वो पीड़ा जो हर दर्शक को भीतर तक छू जाती थी।
आज भी जब कोई “दानवीर कर्ण” कहता है, तो लोगों के मन में पंकज धीर का चेहरा ही उभरता है।
उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया — उन्होंने कर्ण को जीया था।
उनकी यही भूमिका उन्हें भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में अमर बना गई।
टेलीविज़न का सुनहरा सफर
“महाभारत” के बाद पंकज धीर टीवी की दुनिया में सबसे सम्मानित चेहरों में से एक बन गए।
उन्होंने “चंद्रकांता” में राजा शिवदत्त का किरदार निभाया,
“बेताल पच्चीसी”, “सूर्यपुत्र कर्ण”, “युग” और अन्य कई धारावाहिकों में अपनी छाप छोड़ी।
उनकी अदाकारी में गंभीरता, संयम और गरिमा थी।
सेट पर वे एक अनुशासित कलाकार थे —
और उनके सह-अभिनेता उन्हें “acting school” कहा करते थे।
फिल्मों में योगदान
टेलीविज़न के साथ-साथ उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
उन्होंने “बादशाह”, “सैनिक”, “तू चोर मैं सिपाही”, “क्रोध”,
“इक्के पे इक्का”, और “तारज़न – द वंडर कार” जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं।
चाहे पुलिस अधिकारी का रोल हो या पिता का,
उनकी गंभीर आवाज़ और व्यक्तित्व ने हर किरदार को जीवंत बना दिया।
निजी जीवन
पंकज धीर का विवाह नीलिमा धीर से हुआ था।
उनके बेटे निकीतीन धीर भी बॉलीवुड अभिनेता हैं — जिन्होंने “चेन्नई एक्सप्रेस” और “शेरशाह” जैसी फिल्मों में काम किया है।
पिता और बेटे दोनों ने भारतीय सिनेमा में अपनी-अपनी पहचान बनाई।
बीमारी और विदाई
पिछले कुछ वर्षों से पंकज धीर कैंसर से जूझ रहे थे।
इलाज चल रहा था, लेकिन उनकी स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती गई।
अंत में, 15 अक्टूबर 2025 की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।
विरासत और यादें
पंकज धीर सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे — वो उस दौर की पहचान थे, जब टीवी पर हर किरदार एक प्रतीक बन जाता था।
उनका निभाया “कर्ण” भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे यादगार किरदारों में से एक है।
आज भी जब “दानवीर कर्ण” का नाम लिया जाता है, तो दर्शकों के सामने उनका चेहरा ही उभरता है।
उनकी आवाज़, संवाद और भावनाएँ पीढ़ियों तक प्रेरणा देती रहेंगी।
उनका जाना भारतीय टेलीविजन जगत के लिए एक युग का अंत है।
